दिनांक 18 अप्रैल 2026 को केशव माधव सरस्वती विद्या मंदिर वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय ककोड में विश्व धरोहर दिवस एवं भगवान परशुराम जयंती का कार्यक्रम मनाया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष विद्यालय के वरिष्ठ आचार्य श्री संदीप सोलंकी जी एवं मुख्य वक्ता आचार्य श्री पंकज शर्मा जी एवं श्री दीनदयाल शर्मा जी रहे। कार्यक्रम का संचालन आचार्या बहन श्रीमती सोनिया गोस्वामी जी ने किया।कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन एवं पुष्पार्चन के साथ हुआ।कार्यक्रम में विद्यालय के छात्र एवं छात्राओं ने विश्व धरोहर दिवस तथा भगवान परशुराम जी की जयंती पर प्रकाश डाला। मुख्य वक्ता आचार्य श्री पंकज शर्मा जी ने बताया कि विश्व धरोहर दिवस अथवा विश्व विरासत दिवस, प्रतिवर्ष 18 अप्रैल को मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य यह भी है कि पूरे विश्व में मानव सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति जागरूकता लाई जा सके। संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को की पहल पर एक अंतर्राष्ट्रीय संधि की गई जो विश्व के सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के संरक्षण हेतु प्रतिबद्ध है। यह संधि सन् 1972 में लागू की गई। प्रारंभ में मुख्यतः तीन श्रेणियों में धरोहर स्थलों को शामिल किया गया। पहले वे धरोहर स्थल जो प्राकृतिक रूप से संबद्ध हो, दूसरे सांस्कृतिक धरोहर स्थल और तीसरे मिश्रित धरोहर स्थल। वर्ष 1982 में इकोमार्क नामक संस्था ने ट्यूनिशिया में अंतर्राष्ट्रीय स्मारक और स्थल दिवस का आयोजन किया तथा उस सम्मेलन में यह बात भी उठी कि विश्व भर में किसी प्रकार के दिवस का आयोजन किया जाना चाहिए। यूनेस्को के महासम्मेलन में इसके अनुमोदन के पश्चात 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस के रूप में मनाने के लिए घोषणा की गई। पूर्व में 18 अप्रैल को विश्व स्मारक तथा पुरातत्व स्थल दिवस के रूप में मनाए जाने की परंपरा थी। प्रधानाचार्य जी ने स्मारकों एवं प्राचीन स्थलों की जानकारी इकट्ठा करने के लिए छात्रों को एक्टिविटी देने की बात कही। विद्यालय के अध्यक्ष श्री अशोक गुप्ता जी, कोषाध्यक्ष श्री दिनेश सिंघल जी सह व्यवस्थापक श्री कालीचरण जी ने अपनी संस्कृति का प्रचार एवं प्रसार करने के लिए सभी सांस्कृतिक धरोहर के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी हासिल करने की सलाह दी।आचार्य श्री दीनदयाल शर्मा जी ने बताया कि महाभारत और विष्णुपुराण के अनुसार परशुराम का मूल नाम राम था किन्तु जब भगवान शिव ने उन्हें अपना परशु नामक अस्त्र प्रदान किया तभी से उनका नाम परशुराम हो गया। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम कहलाए। वे जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से शार्ङ्ग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया। वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। प्रधानाचार्य श्री मनोज कुमार मिश्र जी ने कहा कि हमें भगवान परशुराम के जीवन से अन्याय के खिलाफ लड़ने, धैर्य, साहस, त्याग और ज्ञान को महत्व देने की शिक्षा मिलती है।कार्यक्रम में विद्यालय के समस्त भैया बहन, आचार्य बंधु एवं आचार्या बहने उपस्थित रहे।